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Thursday, May 22, 2014

सिलचर

२ साल पुरानी बात है ये,
लेकिन लगता है अब तो...
कि १ अरसा सा हो गया है।

दिल्ली पीछे छोड़ के...
सिलचर को गया था मै जब।
बात तभी की है ये।

बहुत दूर था सिलचर।
बहुत दूर था।
दिल्ली से भी...
और मेरे दिल से भी।

ना सोचा था मैने ये कभी...
कि जाऊँगा मै उस ओर कभी।
किंतु नियति का ये खेल तो देखो।
उस दिन मै वहाँ ना सिर्फ़ जा रहा था...
बल्कि...
१ लम्बे अंतराल के लिए जा रहा था।
४ वर्ष...
हाँ ४ वर्ष।

बचपन में जब मै पढ़ता था...
पूर्वोत्तर भारत के बारे मे...
मंत्रमुग्ध मै हो जाता था।
अनोखा लगता था वो क्षेत्र मुझे।
पूर्णत रूप से अचंभित करने वाला।

यह वो जगह है -
जहा पे सर्वाधिक वर्षा होती है।
यह वो जगह है -
जहा से ब्रह्मपुत्रा...
पत्थरो को तोड़ती हुई...
चट्टानों से टकराती हुई...
प्रवाहित होती है।

उम्मीदे तो कम थी सिलचर से बहुत।
जो सफ़र के दौरान और कम होती जा रही थी।
परंतु जैसे ही मै सिलचर पंहुचा,
तो सिलचर को थोड़ा विकसित देख,
उम्मीदे मेरी किसी प्रकार कायम रही।

आज तक मेरी ये उम्मीदे कायम है।
और इन्ही उम्मीदों पे...
२ वर्ष बीत चुके है...
२ वर्ष और व्यतीत करने है।

लेकिन आज मुझे कोई खेद नही...
की मै इस ओर आया।
शायद आज भी दिल्ली से तो बहुत दूर होगा सिलचर...
किंतु अब मेरे दिल मे बस चुका है सिलचर।

हमारे प्यारे पापोन दा।

हमारे प्यारे पापोन दा आए थे। 
हमारे प्यारे पापोन दा आए थे। 
कुछ गाके गए थे। 
क्या गाके गए थे.... 
कोई वो भी समझा दो हमे....  
वैसे बहुत अच्छा लगा हमे।  
अगली बार भी हमारे प्यारे पापोन दा आएँगे।  
फिर से कुछ गाके जाएंगे।  
फिर से कुछ भी समझ मे नहीं आएगा।  
फिर से बहुत अच्छा लगेगा हमे।  
और एक बात.... 
ई कार्पेडियम का होत है।  
कोई बताओ हमे।
बताओ!!
बताओ!!